छिंदवाड़ा दबंग इंडिया कन्हैया विश्वकर्मा। छिंदवाड़ा जहां सरकारें 5 साल में बदल जाती हैं, कलेक्टर 3 साल में नए आ जाते हैं, और ट्रांसफर नीति हर साल ‘नई’ हो जाती है… वहां जनपद पंचायत के कुछ अधिकारी-कर्मचारी पिछले 20-25 साल से एक ही कुर्सी पर ‘जमे’ हुए हैं। जैसे कोई बोर्ड गेम हो और उनका टुकड़ा ‘स्टे इन प्लेस’ कार्ड पर अटक गया हो!
सूत्र बताते हैं कि ट्रांसफर का समय आते ही जनपद के ‘वरिष्ठ’ अधिकारियों को सबसे पहले ‘खबर’ मिल जाती है।
फिर क्या – फोन उठाओ, वरिष्ठों से मिलो, और ट्रांसफर ‘रुक’ जाता है।
कभी-कभी तो इतना प्यार है कि कुछ ग्राम पंचायतों में सचिव 10-15 साल से ‘परिवार जैसा’ महसूस कर रहे हैं – ससुराल में नहीं, लेकिन ‘अपने घर’ जैसा!
मजेदार बात ये है – मध्य प्रदेश सरकार की 2025 की ट्रांसफर नीति साफ कहती है:
एक ही पंचायत में 10 साल से ज्यादा जमे सचिवों को प्राथमिकता से ट्रांसफर करो।
पैतृक या ससुराल वाली पंचायत में तबादला नहीं।
जिले के भीतर भी 10% से ज्यादा नहीं, और पहले 10 साल वाले जाएंगे।
फिर भी छिंदवाड़ा में ‘स्थिरता’ का रिकॉर्ड कायम है।
शायद नीति पढ़ी नहीं, या पढ़कर भी ‘अप्लाई नहीं’ कर पाए।
और हां, विकास का खेल?
मनरेगा, जल जीवन मिशन, स्वच्छ भारत – सब चल रहा है, लेकिन नई ऊर्जा कहां? नए अफसर आते तो शायद नई योजनाएं, नई जांच, नया जोश लाते।
लेकिन यहां तो ‘अनुभव’ का बोझ इतना है कि नई चीजें दबकर रह जाती हैं। स्थानीय लोग कहते हैं – “भाई, अनुभव अच्छा है, लेकिन 25 साल बाद भी वही पुरानी फाइलें, वही पुरानी शिकायतें… विकास कहां पहुंचा?”
ताजा उदाहरण – छिंदवाड़ा में ट्रांसफर रुकवाने के लिए प्रभारी मंत्री राकेश सिंह का फर्जी लेटर तक इस्तेमाल हो चुका है (2025 में FIR हुई थी)।
मतलब, ट्रांसफर रोकने की ‘क्रिएटिविटी’ तो कमाल की है!
तो सवाल ये है – क्या छिंदवाड़ा जनपद में ‘स्थिरता’ विकास की दुश्मन है, या ‘अनुभव’ का खजाना? या फिर बस ‘सिस्टम’ का पुराना जोक, जो हर साल दोहराया जाता है?
सत्ता बदलती है पर ‘कुर्सी’ नहीं: छिंदवाड़ा जनपद में 25 साल से जमे हैं
छिंदवाड़ा: लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि जनता हर पांच साल में सरकार बदल देती है,
ट्रांसफर की खबर मिलते ही सक्रिय हो जाता है ‘नेटवर्क’
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, जब भी विभाग में फेरबदल की सुगबुगाहट होती है या किसी अधिकारी के स्थानांतरण (Transfer) की फाइल हिलती है, तो जनपद में बैठे इन रसूखदारों को इसकी भनक सबसे पहले लग जाती है।
इसके बाद शुरू होता है ‘मैनेजमेंट’ का खेल। वरिष्ठ अधिकारियों से नजदीकी और आपसी तालमेल के दम पर ये कर्मचारी अपना ट्रांसफर रुकवाने में हर बार कामयाब हो जाते हैं। सवाल यह उठता है कि आखिर वरिष्ठ अधिकारी इन ‘चिरस्थायी’ कर्मचारियों पर इतने मेहरबान क्यों हैं?
विकास या भ्रष्टाचार का खेल?
प्रशासन से अपील: नीति को ‘अप्लाई’ करो, कुर्सियां हिलाओ, नए लोगों को मौका दो। वरना 25 साल बाद भी यही खबर चलेगी “छिंदवाड़ा में अधिकारी नहीं बदलते, सिर्फ फाइलें पुरानी होती जाती हैं।”
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